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शान्ति पर्व
अध्याय ६४
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इन्द्र उवाच
किमिष्यते धर्मभृतां वरिष्ठ; यद्द्रष्टुकामोऽसि तमप्रमेय़म् |  १५   क
अनन्तमाय़ामितसत्त्ववीर्यं; नाराय़णं ह्यादिदेवं पुराणम् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति