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शान्ति पर्व
अध्याय ६४
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इन्द्र उवाच
सत्ये स्थितो धर्मपरो जितेन्द्रिय़ः; शूरो दृढं प्रीतिरतः सुराणाम् |  १७   क
वुद्ध्या भक्त्या चोत्तमश्रद्धय़ा च; ततस्तेऽहं दद्मि वरं यथेष्टम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति