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शान्ति पर्व
अध्याय ६४
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मान्धातो उवाच
असंशय़ं भगवन्नादिदेवं; द्रक्ष्याम्यहं शिरसाहं प्रसाद्य |  १८   क
त्यक्त्वा भोगान्धर्मकामो ह्यरण्य; मिच्छे गन्तुं सत्पथं लोकजुष्टम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति