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शान्ति पर्व
अध्याय ६४
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इन्द्र उवाच
यदि ह्यसौ भगवान्नाहनिष्य; द्रिपून्सर्वान्वसुमानप्रमेय़ः |  २३   क
न व्राह्मणा न च लोकादिकर्ता; न सद्धर्मा नादिधर्मा भवेय़ुः ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति