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शान्ति पर्व
अध्याय ६८
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भीष्म उवाच
राजा प्रगल्भं पुरुषं करोति; राजा कृशं वृंहय़ते मनुष्यम् |  ५८   क
राजाभिपन्नस्य कुतः सुखानि; राजाभ्युपेतं सुखिनं करोति ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति