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वन पर्व
अध्याय १७२
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः सुदंशितस्तेन कवचेन सुवर्चसा |  ५   क
धनुरादाय़ गाण्डीवं देवदत्तं च वारिजम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति