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सभा पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
निवार्य तं महावाहुं कोपसंरक्तलोचनम् |  १७   क
पितरं समुपातिष्ठद्धृतराष्ट्रं कृताञ्जलिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति