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वन पर्व
अध्याय ६४
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वृहदश्व उवाच
एवं व्रुवन्तं राजानं निशाय़ां जीवलोऽव्रवीत् |  ११   क
कामेनां शोचसे नित्यं श्रोतुमिच्छामि वाहुक ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति