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वन पर्व
अध्याय ६४
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वृहदश्व उवाच
दह्यमानः स शोकेन दिवारात्रमतन्द्रितः |  १४   क
निशाकाले स्मरंस्तस्याः श्लोकमेकं स्म गाय़ति ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति