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वन पर्व
अध्याय ६४
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वृहदश्व उवाच
स वै भ्रमन्महीं सर्वां क्वचिदासाद्य किञ्चन |  १५   क
वसत्यनर्हस्तद्दुःखं भूय़ एवानुसंस्मरन् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति