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वन पर्व
अध्याय ६४
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वृहदश्व उवाच
स तत्र निवसन्राजा वैदर्भीमनुचिन्तय़न् |  ९   क
साय़ं साय़ं सदा चेमं श्लोकमेकं जगाद ह ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति