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विराट पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
शोणिते तु व्यतिक्रान्ते प्रविवेश वृहन्नडा |  १०   क
अभिवाद्य विराटं च कङ्कं चाप्युपतिष्ठत ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति