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विराट पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमाख्याय़मानं तु छन्नं सत्रेण पाण्डवम् |  ३३   क
वसन्तं तत्र नाज्ञासीद्विराटः पार्थमर्जुनम् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति