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विराट पर्व
अध्याय ६४
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उत्तर उवाच
अकार्यं ते कृतं राजन्क्षिप्रमेव प्रसाद्यताम् |  ५   क
मा त्वा व्रह्मविषं घोरं समूलमपि निर्दहेत् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति