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विराट पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
यदि ह्येतत्पतेद्भूमौ रुधिरं मम नस्ततः |  ८   क
सराष्ट्रस्त्वं महाराज विनश्येथा न संशय़ः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति