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द्रोण पर्व
अध्याय ६५
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सञ्जय़ उवाच
केचिदेकेन वाणेन सुमुक्तेन पतत्रिणा |  २२   क
द्वौ त्रय़श्च विनिर्भिन्ना निपेतुर्धरणीतले ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति