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उद्योग पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
ततोऽहमामन्त्र्य चतुर्भुजं हरिं; धनञ्जय़ं चैव नमस्य सत्वरः |  १५   क
जवेन सम्प्राप्त इहामरद्युते; तवान्तिकं प्रापय़ितुं वचो महत् ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति