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सभा पर्व
अध्याय ४३
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वैशम्पाय़न उवाच
स तु गच्छन्ननेकाग्रः सभामेवानुचिन्तय़न् |  १६   क
श्रिय़ं च तामनुपमां धर्मराजस्य धीमतः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति