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द्रोण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
तपनीय़विचित्राणि सिक्तानि रुधिरेण च |  ३७   क
अदृश्यन्त यथा राजन्मेघसङ्घाः सविद्युतः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति