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द्रोण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे |  ४३   क
पार्थभूतममन्यन्त जगत्कालेन मोहिताः ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति