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द्रोण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
पार्ष्ण्यङ्गुष्ठाङ्कुशैर्नागांश्चोदय़न्तस्तथापरे |  ६०   क
शरैः संमोहिताश्चान्ये तमेवाभिमुखा यय़ौ |  ६०   ख
तव योधा हतोत्साहा विभ्रान्तमनसस्तदा ||  ६०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति