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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
तद्देवनागासुरसिद्धसङ्घै; र्गन्धर्वय़क्षाप्सरसां च सङ्घैः |  १   क
व्रह्मर्षिराजर्षिसुपर्णजुष्टं; वभौ विय़द्विस्मय़नीय़रूपम् ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति