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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
ततो विसस्रुः पुनरर्दिताः शरै; र्नरोत्तमाभ्यां कुरुपाण्डवाश्रय़ाः |  १३   क
सनागपत्त्यश्वरथा दिशो गता; स्तथा यथा सिंहभय़ाद्वनौकसः ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति