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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
ततस्तु दुर्योधनभोजसौवलाः; कृपश्च शारद्वतसूनुना सह |  १४   क
महारथाः पञ्च धनञ्जय़ाच्युतौ; शरैः शरीरान्तकरैरताडय़न् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति