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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
वराय़ुधान्पाणिगतान्करैः सह; क्षुरैर्न्यकृन्तंस्त्वरिताः शिरांसि च |  १७   क
हय़ांश्च नागांश्च रथांश्च युध्यतां; धनञ्जय़ः शत्रुगणं तमक्षिणोत् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति