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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
तदद्भुतं देवमनुष्यसाक्षिकं; समीक्ष्य भूतानि विसिष्मिय़ुर्नृप |  १९   क
तवात्मजः सूतसुतश्च न व्यथां; न विस्मय़ं जग्मतुरेकनिश्चय़ौ ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति