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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
नानद्यमानं निनदैर्मनोज्ञै; र्वादित्रगीतस्तुतिभिश्च नृत्तैः |  २   क
सर्वेऽन्तरिक्षे ददृशुर्मनुष्याः; खस्थांश्च तान्विस्मय़नीय़रूपान् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति