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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
धनञ्जय़ः स्थास्यति वारितो मय़ा; जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति |  २२   क
युधिष्ठिरो भूतहिते सदा रतो; वृकोदरस्तद्वशगस्तथा यमौ ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति