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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
वदन्ति मित्रं सहजं विचक्षणा; स्तथैव साम्ना च धनेन चार्जितम् |  २७   क
प्रतापतश्चोपनतं चतुर्विधं; तदस्ति सर्वं त्वय़ि पाण्डवेषु च ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति