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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
निहत्य दुःशासनमुक्तवान्वहु; प्रसह्य शार्दूलवदेष दुर्मतिः |  ३०   क
वृकोदरस्तद्धृदय़े मम स्थितं; न तत्परोक्षं भवतः कुतः शमः ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति