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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
न चापि कर्णं गुरुपुत्र संस्तवा; दुपारमेत्यर्हसि वक्तुमच्युत |  ३१   क
श्रमेण युक्तो महताद्य फल्गुन; स्तमेष कर्णः प्रसभं हनिष्यति ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति