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कर्ण पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
तमेवमुक्त्वाभ्यनुनीय़ चासकृ; त्तवात्मजः स्वाननुशास्ति सैनिकान् |  ३२   क
समाघ्नताभिद्रवताहितानिमा; न्सवाणशव्दान्किमु जोषमास्यते ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति