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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
भूत्वा हि नृपतिः पूर्वं समाज्ञाप्य च मेदिनीम् |  १३   क
कथमेकोऽद्य राजेन्द्र तिष्ठसे निर्जने वने ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति