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वन पर्व
अध्याय २६५
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मार्कण्डेय़ उवाच
राक्षसीभिः परिवृता वैदेही शोककर्शिता |  ३०   क
सेव्यमाना त्रिजटय़ा तत्रैव न्यवसत्तदा ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति