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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
अध्रुवा सर्वमर्त्येषु ध्रुवं श्रीरुपलक्ष्यते |  १९   क
भवतो व्यसनं दृष्ट्वा शक्रविस्पर्धिनो भृशम् ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति