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वन पर्व
अध्याय ४७
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा तेषां वसतां काम्यके वै; विहीनानामर्जुनेनोत्सुकानाम् |  १२   क
पञ्चैव वर्षाणि तदा व्यतीय़ु; रधीय़तां जपतां जुह्वतां च ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति