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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
उत्साहश्च कृतो नित्यं मय़ा दिष्ट्या युय़ुत्सता |  २५   क
दिष्ट्या चास्मि हतो युद्धे निहतज्ञातिवान्धवः ||  २५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति