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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
दिष्ट्या च वोऽहं पश्यामि मुक्तानस्माज्जनक्षय़ात् |  २६   क
स्वस्तिय़ुक्तांश्च कल्यांश्च तन्मे प्रिय़मनुत्तमम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति