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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
स मय़ा समनुप्राप्तो नास्मि शोच्यः कथञ्चन |  २९   क
कृतं भवद्भिः सदृशमनुरूपमिवात्मनः |  २९   ख
यतितं विजय़े नित्यं दैवं तु दुरतिक्रमम् ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति