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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
तत्रापश्यन्महात्मानं धार्तराष्ट्रं निपातितम् |  ३   क
प्रभग्नं वाय़ुवेगेन महाशालं यथा वने ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति