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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
तथा तु दृष्ट्वा राजानं वाष्पशोकसमन्वितम् |  ३१   क
द्रौणिः क्रोधेन जज्वाल यथा वह्निर्जगत्क्षय़े ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति