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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
स तु क्रोधसमाविष्टः पाणौ पाणिं निपीड्य च |  ३२   क
वाष्पविह्वलय़ा वाचा राजानमिदमव्रवीत् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति