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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
दुर्योधनोऽपि राजेन्द्र शोणितौघपरिप्लुतः |  ४२   क
तां निशां प्रतिपेदेऽथ सर्वभूतभय़ावहाम् ||  ४२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति