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शल्य पर्व
अध्याय ६४
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सञ्जय़ उवाच
विवर्तमानं वहुशो रुधिरौघपरिप्लुतम् |  ५   क
यदृच्छय़ा निपतितं चक्रमादित्यगोचरम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति