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द्रोण पर्व
अध्याय १६६
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सञ्जय़ उवाच
भेरीश्चाभ्यहनन्हृष्टा डिण्डिमांश्च सहस्रशः |  ५८   क
तथा ननाद वसुधा खुरनेमिप्रपीडिता |  ५८   ख
स शव्दस्तुमुलः खं द्यां पृथिवीं च व्यनादय़त् ||  ५८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति