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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः पुनर्भीमरवं प्रगृह्य; दोर्भ्यां महाशङ्खमुदारघोषम् |  १०   क
व्यनादय़त्स प्रदिशो दिशः खं; भुवं च पार्थो द्विषतां निहन्ता ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति