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आदि पर्व
अध्याय ६५
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वैशम्पाय़न उवाच
दर्शनादेव हि शुभे त्वय़ा मेऽपहृतं मनः |  १३   क
इच्छामि त्वामहं ज्ञातुं तन्ममाचक्ष्व शोभने ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति