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वन पर्व
अध्याय २२१
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्राय़ः शरैर्विनिहता महासेनेन धीमता |  ६८   क
शेषा दैत्यगणा घोरा भीतास्त्रस्ता दुरासदैः |  ६८   ख
स्कन्दस्य पार्षदैर्हत्वा भक्षिताः शतसङ्घशः ||  ६८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति