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आदि पर्व
अध्याय ८०
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वैशम्पाय़न उवाच
परिसङ्ख्याय़ कालज्ञः कलाः काष्ठाश्च वीर्यवान् |  ८   क
पूर्णं मत्वा ततः कालं पूरुं पुत्रमुवाच ह ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति