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द्रोण पर्व
अध्याय ९८
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सञ्जय़ उवाच
ततो हा हेति सहसा नादः समभवन्नृप |  ४४   क
पाञ्चाल्येन रणे दृष्ट्वा द्रोणमावारितं शरैः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति